सोशल मीडिया पर सरकार की सख्ती: मार्च-जुलाई के बीच हर मिनट भेजा गया ब्लॉकिंग आदेश
मार्च से जुलाई के बीच सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों को बड़ी संख्या में सामग्री और खातों को ब्लॉक करने के आदेश भेजे। इस दौरान सरकारी ब्लॉकिंग आदेशों की संख्या को लेकर नई बहस शुरू हुई है।
नई दिल्ली: भारत में सोशल मीडिया मंचों पर सरकारी निगरानी और सामग्री हटाने को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। मार्च से जुलाई के बीच केंद्र सरकार की ओर से सोशल मीडिया कंपनियों को भेजे गए ब्लॉकिंग आदेशों की संख्या इतनी अधिक रही कि औसतन हर मिनट एक आदेश भेजे जाने की बात सामने आई है।
इन आदेशों के जरिए सोशल मीडिया कंपनियों को कुछ सामग्री, खातों या ऑनलाइन गतिविधियों तक भारत में पहुंच रोकने के निर्देश दिए गए। यह कार्रवाई मुख्य रूप से सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत सरकार को प्राप्त अधिकारों के इस्तेमाल से जुड़ी है।
क्या है ब्लॉकिंग आदेश?
सरकार को सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत कुछ परिस्थितियों में ऑनलाइन सामग्री की पहुंच रोकने का अधिकार प्राप्त है। राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और अन्य निर्धारित आधारों पर संबंधित सामग्री को भारत में प्रतिबंधित करने के निर्देश दिए जा सकते हैं।
सोशल मीडिया कंपनियों को ऐसे आदेश मिलने के बाद संबंधित सामग्री या खाते को निर्धारित तरीके से रोकना पड़ता है। आदेशों का पालन नहीं करने पर संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई का प्रावधान भी है।
सोशल मीडिया कंपनियों और सरकार के बीच पहले भी टकराव
भारत में सोशल मीडिया मंचों और सरकार के बीच सामग्री हटाने तथा खातों को ब्लॉक करने को लेकर पहले भी विवाद सामने आते रहे हैं। विशेष रूप से एक्स ने कई मौकों पर सरकारी आदेशों की संख्या और उनकी प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाए हैं।
जुलाई 2025 में एक्स ने दावा किया था कि भारत सरकार ने उसे 2,355 खातों को भारत में ब्लॉक करने के आदेश दिए थे, जिनमें अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी रॉयटर्स से जुड़े खाते भी शामिल थे। सरकार ने हालांकि इस दावे के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि उसने 3 जुलाई को कोई नया ब्लॉकिंग आदेश जारी नहीं किया था।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बहस
बड़ी संख्या में ब्लॉकिंग आदेश जारी होने से इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सरकारी अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर बहस बढ़ती है।
सरकार का पक्ष यह है कि कानून का उल्लंघन करने वाली, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली ऑनलाइन सामग्री पर कार्रवाई जरूरी है। वहीं आलोचकों का कहना है कि सामग्री को हटाने या खाते बंद करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और स्वतंत्र निगरानी जरूरी है।
अदालतों में भी पहुंचा मामला
सोशल मीडिया सामग्री को ब्लॉक करने के सरकारी अधिकारों को लेकर मामले अदालतों तक भी पहुंचे हैं। सोशल मीडिया कंपनियों ने कई मामलों में सरकारी आदेशों की वैधता और प्रक्रिया को चुनौती दी है।
ऐसे मामलों में मुख्य सवाल यह रहता है कि सरकार द्वारा किसी सामग्री को हटाने का आदेश कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप था या नहीं और क्या संबंधित व्यक्ति या संस्था को उस आदेश को चुनौती देने का प्रभावी अवसर मिला।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
सोशल मीडिया आज समाचार, राजनीति और जनमत का बड़ा माध्यम बन चुका है। ऐसे में बड़ी संख्या में सरकारी ब्लॉकिंग आदेश सीधे तौर पर डिजिटल सूचना के प्रवाह को प्रभावित कर सकते हैं।
एक तरफ सरकार के लिए गैरकानूनी और खतरनाक सामग्री पर कार्रवाई करना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि वैध आलोचना, पत्रकारिता और नागरिकों की अभिव्यक्ति अनावश्यक रूप से प्रभावित न हो।
मार्च से जुलाई के बीच बड़ी संख्या में जारी किए गए ब्लॉकिंग आदेश इसी व्यापक बहस को फिर सामने लाते हैं कि डिजिटल मंचों पर सरकारी नियंत्रण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच सही संतुलन कैसे बनाया जाए।
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