अमेरिका ने ईरान पर दागीं 850 टॉमहॉक मिसाइलें, लंबी जंग में स्टॉक खत्म होने का खतरा

ईरान के साथ संघर्ष में अमेरिका ने 850 से ज्यादा टॉमहॉक मिसाइलें दागीं। सीमित उत्पादन और लंबा निर्माण समय अमेरिकी रक्षा रणनीति के लिए चुनौती बन सकता है।

Mar 28, 2026 - 11:40
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अमेरिका ने ईरान पर दागीं 850 टॉमहॉक मिसाइलें, लंबी जंग में स्टॉक खत्म होने का खतरा
US-Iran Conflict: 4 हफ्तों में 850 टॉमहॉक मिसाइलों का इस्तेमाल, उत्पादन धीमा; पेंटागन की बढ़ी चिंता

ईरान के साथ जारी संघर्ष में अमेरिका ने अपने सबसे घातक हथियारों में से एक टॉमहॉक क्रूज मिसाइल का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, सिर्फ चार हफ्तों के भीतर 850 से ज्यादा मिसाइलें दागी गई हैं, जिससे अमेरिकी हथियार भंडार को लेकर चिंता बढ़ने लगी है।

अनुमान है कि अमेरिका के पास कुल करीब 4000 टॉमहॉक मिसाइलें थीं। ऐसे में हालिया हमलों के बाद इनका एक बड़ा हिस्सा खर्च हो चुका है। अगर युद्ध लंबा चलता है, तो इनकी कमी गंभीर रणनीतिक चुनौती बन सकती है।

क्या है टॉमहॉक मिसाइल की ताकत?

टॉमहॉक एक लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल है, जो करीब 1600 किलोमीटर या उससे ज्यादा दूरी तक सटीक निशाना साध सकती है। इसके आधुनिक संस्करण की रेंज 2500 किलोमीटर तक बताई जाती है।

यह मिसाइल समुद्र में तैनात युद्धपोतों और पनडुब्बियों से लॉन्च की जा सकती है, जिससे बिना दुश्मन की सीमा में प्रवेश किए हमला करना संभव हो जाता है। इसी कारण इसे “स्टैंड-ऑफ स्ट्राइक” हथियार कहा जाता है।

क्यों बढ़ रही है अमेरिका की चिंता?

सबसे बड़ी समस्या इसकी उत्पादन गति है। एक टॉमहॉक मिसाइल तैयार होने में करीब 2 साल लग सकते हैं, जबकि सालाना उत्पादन लगभग 600 यूनिट के आसपास ही है।

तेजी से इस्तेमाल होने पर स्टॉक जल्दी घटता है, लेकिन उसे फिर से भरने में कई साल लग जाते हैं। यही वजह है कि पेंटागन के भीतर अब इसको लेकर रणनीतिक चिंता बढ़ रही है।

जापान के साथ डील क्यों अटकी?

अमेरिका ने उत्पादन बढ़ाने के लिए जापान के साथ मिलकर मिसाइल निर्माण की योजना बनाई थी। इससे उत्पादन क्षमता दोगुनी हो सकती थी।

लेकिन इस योजना पर कई शर्तें और तकनीकी नियंत्रण जुड़े थे, जैसे:

  • डिजाइन और टेक्नोलॉजी पर पूरा अधिकार अमेरिका का
  • बिना अनुमति तीसरे देश को निर्यात पर रोक
  • सीमित टेक्नोलॉजी ट्रांसफर

इन शर्तों और सुरक्षा चिंताओं के कारण अमेरिका के अंदर ही इस डील का विरोध शुरू हो गया और योजना फिलहाल अटक गई।

चीन से मिल रही चुनौती

रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता तेजी से बढ़ रही है और वह अमेरिका से कई गुना तेजी से रक्षा उत्पादन बढ़ा रहा है।

जहां वैश्विक उत्पादन में चीन की हिस्सेदारी करीब 28% है, वहीं अमेरिका लगभग 17% पर है। यही अंतर अब सैन्य ताकत में भी दिखने लगा है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह अंतर बढ़ता रहा, तो अमेरिका को भविष्य में रणनीतिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।

ग्लोबल रणनीति में बदलाव की जरूरत

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका अब अकेले वैश्विक सैन्य संतुलन बनाए नहीं रख सकता। उसे जापान, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर रणनीति बनानी होगी।

पहले कई देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर निर्भर थे, लेकिन अब बदलते वैश्विक हालात में उन्हें भी अपनी रक्षा क्षमता बढ़ानी पड़ रही है।

होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ा तनाव

ईरान के साथ बढ़ते तनाव का असर वैश्विक व्यापार पर भी दिख रहा है। होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखा जा रहा है।

क्या आगे और बढ़ेगा संकट?

अगर अमेरिका-ईरान संघर्ष लंबा खिंचता है, तो मिसाइल स्टॉक, उत्पादन क्षमता और वैश्विक गठबंधनों की परीक्षा होगी। यह सिर्फ एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाली स्थिति बनती जा रही है।

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