बिहार वोटर लिस्ट रिवीजन पर सुप्रीम कोर्ट में घमासान, चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया पर उठे सवाल

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिकाओं में इसे मनमाना बताते हुए करोड़ों मतदाताओं के अधिकार प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।

May 27, 2026 - 12:34
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बिहार वोटर लिस्ट रिवीजन पर सुप्रीम कोर्ट में घमासान, चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया पर उठे सवाल
बिहार में मतदाता सूची संशोधन विवाद: चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट पहुंची

बिहार विधानसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग द्वारा शुरू की गई मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक और कानूनी विवाद गहरा गया है। इस मामले में कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुकी हैं, जिनमें आरोप लगाया गया है कि यह प्रक्रिया लाखों लोगों के मतदान अधिकार को प्रभावित कर सकती है।

चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को घोषणा की थी कि राज्य में मतदाता सूची का व्यापक सत्यापन अभियान चलाया जाएगा। आयोग का कहना है कि इस प्रक्रिया का मकसद केवल पात्र नागरिकों को मतदाता सूची में बनाए रखना और अपात्र लोगों के नाम हटाना है। इसके तहत मृत, स्थानांतरित या लंबे समय से अनुपस्थित मतदाताओं की पहचान भी की जाएगी।

आयोग ने स्पष्ट किया कि यह अभियान संविधान के अनुच्छेद 324 और 326 तथा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950 की धारा 16 और 21 के प्रावधानों के तहत संचालित किया जा रहा है। नियमों के अनुसार, 18 वर्ष या उससे अधिक आयु का भारतीय नागरिक मतदान के लिए पात्र है, जबकि गैर-नागरिक, मानसिक रूप से अयोग्य या चुनावी अपराधों में दोषी व्यक्ति अयोग्य माने जा सकते हैं।

घर-घर सत्यापन की प्रक्रिया

SIR अभियान के तहत बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) घर-घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन कर रहे हैं। मतदाताओं को गणना प्रपत्र भरकर आवश्यक दस्तावेज जमा करने होंगे। चुनाव आयोग ने ऑनलाइन दस्तावेज अपलोड की सुविधा भी उपलब्ध कराई है।

आयोग ने राजनीतिक दलों से भी सहयोग मांगा है और प्रत्येक बूथ पर बूथ लेवल एजेंट नियुक्त करने का आग्रह किया है ताकि किसी भी विवाद या त्रुटि को शुरुआती स्तर पर ही सुलझाया जा सके।

याचिकाओं में क्या उठाए गए सवाल?

लोकतांत्रिक सुधार संगठन ADR और सामाजिक कार्यकर्ता Yogendra Yadav समेत कई पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर इस प्रक्रिया को चुनौती दी है। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि मतदाता पहचान और नागरिकता साबित करने का बोझ सीधे नागरिकों पर डाल दिया गया है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि आधार कार्ड और राशन कार्ड जैसे सामान्य दस्तावेजों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, जबकि माता-पिता की पहचान से जुड़े दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। उनका तर्क है कि बिहार जैसे राज्य में, जहां गरीबी, पलायन और बाढ़ जैसी समस्याएं आम हैं, लाखों लोग जरूरी दस्तावेज समय पर उपलब्ध नहीं करा पाएंगे।

इसके अलावा, कम समय सीमा और BLO की कमी को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। याचिका में दावा किया गया कि इतने कम समय में लाखों मतदाताओं का सत्यापन करना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन है।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

7 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई के लिए सहमति दी थी। बाद में लंबी बहस के बाद 29 जनवरी 2026 को अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। वहीं, पश्चिम बंगाल में भी इसी तरह की SIR प्रक्रिया को लेकर मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की ओर से चुनौती दी गई, जिस पर अदालत ने नोटिस जारी किया।

इस बीच चुनाव आयोग लगातार यह कहता रहा है कि SIR प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं किया गया है और यह पूरी तरह पारदर्शी तरीके से जारी रहेगी। आयोग का दावा है कि मतदाता सूची की शुद्धता बनाए रखना निष्पक्ष चुनावों के लिए बेहद जरूरी है।

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