सोमनाथ से स्वतंत्र भारत तक: गजनवी का हमला, अकूत लूट और नेहरू का विरोध क्यों बना विवाद?

सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के हमले, कथित सोना लूट और शिवलिंग खंडन से लेकर आज़ादी के बाद नेहरू के मंदिर पुनर्निर्माण विरोध तक, जानिए पूरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि।

Jan 12, 2026 - 13:24
 0  2
सोमनाथ से स्वतंत्र भारत तक: गजनवी का हमला, अकूत लूट और नेहरू का विरोध क्यों बना विवाद?
गजनवी ने सोमनाथ शिवलिंग के टुकड़े मस्जिद में लगवाए, 6 टन सोना लूटा; नेहरू मंदिर निर्माण के इतने खिलाफ क्यों थे?

सोमनाथ मंदिर का नाम आते ही भारतीय इतिहास के कई अध्याय एक साथ खुल जाते हैं। यह केवल एक प्राचीन शिव मंदिर नहीं, बल्कि सत्ता, आस्था और विचारधारा के टकराव की कहानी भी है। 11वीं सदी में महमूद गजनवी के आक्रमण से लेकर आज़ादी के बाद मंदिर पुनर्निर्माण पर नेहरू के विरोध तक, यह मुद्दा सदियों से बहस का विषय बना हुआ है।

महमूद गजनवी का आक्रमण: आस्था पर चोट या सत्ता की राजनीति?

इतिहास में दर्ज है कि 1025 ईस्वी में ग़ज़नी के शासक महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर हमला किया। उस दौर में सोमनाथ पश्चिमी भारत का सबसे समृद्ध धार्मिक केंद्र था। विदेशी यात्रियों और फारसी इतिहासकारों के लेखन के अनुसार, मंदिर में दूर-दूर से चढ़ावा आता था और इसकी ख्याति अरब देशों तक फैली हुई थी।

कई ऐतिहासिक कथाओं में यह दावा किया जाता है कि गजनवी ने शिवलिंग को तोड़कर उसके टुकड़े ग़ज़नी की एक मस्जिद में सीढ़ियों में जड़वा दिए, ताकि विजयोत्सव का प्रतीक बनाया जा सके। हालांकि, आधुनिक इतिहासकार इस दावे को लेकर एकमत नहीं हैं और इसे प्रतीकात्मक विवरण भी मानते हैं।

6 टन सोना लूटने की कहानी

सोमनाथ पर हमले के साथ जुड़ा सबसे बड़ा दावा है—लगभग 6 टन सोना लूटने का। कुछ मध्यकालीन स्रोतों में लिखा गया है कि मंदिर की संपत्ति इतनी अधिक थी कि ऊंटों के काफ़िले भरकर धन ग़ज़नी ले जाया गया।
हालांकि, समकालीन इतिहासकार मानते हैं कि सटीक मात्रा बताना कठिन है, लेकिन यह तय है कि यह हमला केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आर्थिक लूट का बड़ा अभियान भी था।

मंदिर का पुनर्जन्म और भारतीय चेतना

सोमनाथ मंदिर को इतिहास में कई बार तोड़ा गया, लेकिन हर बार इसे फिर से खड़ा किया गया। यही कारण है कि इसे भारतीय सांस्कृतिक जिजीविषा का प्रतीक माना जाता है। मंदिर का अस्तित्व यह दिखाता है कि आक्रमणों के बावजूद भारतीय समाज ने अपनी आस्था को जीवित रखा।

🇮🇳 आज़ादी के बाद नई बहस: नेहरू क्यों थे विरोध में?

1947 के बाद जब सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की बात उठी, तो यह केवल धार्मिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और वैचारिक बहस में बदल गया।

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का मानना था कि:

  • भारत को एक आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ना चाहिए

  • राज्य को धार्मिक प्रतीकों से दूरी बनाए रखनी चाहिए

  • मंदिर निर्माण में सरकारी हस्तक्षेप से गलत संदेश जा सकता है

इसके विपरीत, सरदार वल्लभभाई पटेल ने इसे राष्ट्रीय स्वाभिमान से जोड़ा और जनता के सहयोग से मंदिर पुनर्निर्माण का समर्थन किया।

राष्ट्रपति का उद्घाटन और विवाद

1951 में जब राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया, तब भी यह मुद्दा राजनीतिक हलकों में चर्चा में रहा। नेहरू इस कार्यक्रम से दूरी बनाए हुए थे, लेकिन जनता के बीच मंदिर पुनर्निर्माण को व्यापक समर्थन मिला।

निष्कर्ष

सोमनाथ मंदिर की कहानी केवल अतीत की नहीं, बल्कि आज की सोच और विचारधाराओं से भी जुड़ी है। गजनवी का आक्रमण हो या नेहरू-पटेल का मतभेद—यह विषय बताता है कि इतिहास सिर्फ़ घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि दृष्टिकोणों की लड़ाई भी है

What's Your Reaction?

Like Like 0
Dislike Dislike 0
Love Love 0
Funny Funny 0
Angry Angry 0
Sad Sad 0
Wow Wow 0